गुरु तेग बहादुर जी की जयंती, गुरु तेग बहादुर जी शहीदी दिवस, गुरु तेग बहादुर जी का जन्म और बचपन की सम्पूर्ण जानकारी, गुरु तेग बहादुर जी का आध्यात्मिक जीवन और धार्मिक यात्राएं, गुरु तेग बहादुर जी के बलिदान का वर्णन, गुरु तेग
बहादुर जी की शहादत
गुरु तेग बहादुर जी सिख धर्म के महान गुरु थे. उन्होंने अपने प्राणों का बलिदान देकर अपने धर्म की रक्षा करके पूरे विश्व को मिसाल दी ।गुरु तेग बहादुर जी ने कहा था "शीश कटा सकते है केश नहीं". उन्होंने हर धर्म के लोगों को सीख दी कि धर्म की रक्षा के लिए यदि अपने प्राणों की भी आहूति देनी पढ़े, तो उसमें हमें पीछे नहीं हटना चाहिए। गुरु तेग बहादुर जी सिख धर्म के 9 वे गुरु थे। वह औरंगजेब के द्वारा हिन्दू लोगों का जबरदस्ती इस्लाम धर्म कबूल करवाने के सख्त विरोधी थे. उन्होंने सिख धर्म के पवित्र गुरु ग्रंथ साहिब में 115 सबद भी लिखे थे और पंजाब में स्थित आनंदपुर साहिब शहर को भी बनवा कर बसाया था। औरंगजेब के आदेश पर उनकी हत्या शीश गंज गुरुद्वारा (दिल्ली) के बहार करि गई थी, और उनके पवित्र शरीर का अंतिम संस्कार गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब (दिल्ली) में किया गया था। गुरु तेग बहादुर जी वीर योद्धा के साथ धर्म प्रचारक और कवि भी थे. वह प्रेम , त्याग और बलिदान के एक बहुत बड़े आदर्श है।
गुरु तेग बहादुर जी का जन्म
और बचपन की सम्पूर्ण जानकारी !
गुरु
तेग बहादुर जी का जन्म पंजाब के अमृतसर शहर में 01 अप्रैल,1621 को गुरु हरगोविंद सिंह जी और नानकी जी के घर
हुआ था. उनके बचपन का नाम त्याग मल था, जो आगे चलकर उनकी वीरता को देखकर तेग बहादुर पड़ा। तेग
बहादुर जी के पिता गुरु हरगोविंद सिंह सिख धर्म के छठवें गुरु थे. वह गुरु
हरगोविंद सिंह जी की पाँचवें पुत्र थे.
त्याग मल ( तेग बहादुर जी बचपन का नाम) बचपन से ही संत स्वरूप, निडर और वीर स्वभाव के धनी थे, उनकी बचपन की शिक्षा पिता गुरु हरगोविंद सिंह जी की देख रेंक
में हुई। तब उन्होंने गुरुबाणी के साथ हिंदी के धर्मग्रंथों और संस्कृत के
शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया, इसके
साथ घुड़सवारी, तीरंदाजी और तलवार बाजी
का भी हुनर लिया।
गुरु तेग बहादुर जी ने मात्र 14 वर्ष की आयु में अपने पिता के साथ करतारपुर में मुगलों के खिलाफ लड़ाई में भाग लेकर मुगलों की सेना को अपनी वीरता का परिचय कराया। तब उनके पिता गुरु हरगोविंद सिंह जी ने उनकी बहादुरी और तलवारबाजी का हुनर देखकर उनका नाम त्याग मल से तेग बहादुर रखकर संबोधित करा, तब से उन्हें तेग बहादुर के नाम से जाना गया। साल 1632 में उन्होंने करतारपुर निवासी माता गुजरी से विवाह किया।
|
पूरा नाम(Full
Name) |
गुरु तेग बहादुर जी |
|
बचपन का नाम(Childhood
Name) |
त्याग मल |
|
जन्म दिनांक(Birth
Date) |
01 अप्रैल 1621 |
|
जन्म स्थान(Birth
Place) |
अमृतसर, पंजाब |
|
पिता(Father) |
गुरु हरगोविंद सिंह जी (सिख धर्म के छठवें गुरु) |
|
माता(Mother) |
नानकी जी |
|
पुत्र(Son) |
गुरु गोविंद सिंह जी (सिख धर्म के दसवें गुरु) |
|
पत्नी(Wife) |
माता गुजरी |
|
पेशा(Profession) |
सिख धर्म के नौवें गुरु |
|
शहीदी दिनांक (Martyrdom
Date) |
24 नवंबर,1675 (54 वर्ष) |
|
शहीदी स्थल |
चांदनी चौक, दिल्ली (शीशगंज
साहिब गुरुद्वारा) |
गुरु तेग बहादुर जी का
आध्यात्मिक जीवन और धार्मिक यात्राएं !
करतारपुर
युद्ध में खून खराबा देखकर गुरु तेग बहादुर जी का मन उदास हो गया। उन्होंने सब से
अलग होकर अपना अधिकतर समय एकांत जगह पर ध्यान लगाने में व्यतीत करने लगे। उनका मन
आध्यात्मिक जीवन की और बढ़ता गया। पिता गुरु हरगोविंद सिंह जी की पवित्र आत्मा जब
शरीर त्याग देती है। तब गुरु तेग बहादुर जी अपनी पत्नी और माँ के साथ बाबा बकाला
नाम के एक गांव में चले जाते है। बाबा बकाला पर उन्होंने एकांत में रहकर 20 वर्षो
तक परमात्मा की आराधना कि। सिखों के आठवें गुरु हरकिशन जी ने अपने अंतिम समय पर
भक्तों के सामने अपना उत्तराधिकारी बाबा बकाले का नाम लेकर घोषणा कि। 20 मार्च,1664 को गुरु तेग बहादुर जी सिख धर्म के नौवें गुरु बने।
गुरु
तेग बहादुर जी ने धर्म के प्रचार - प्रसार के लिए भारत के कई क्षेत्रों की
यात्राएं कि, इन यात्राओं में वह
आनंदपुर साहब से कीरतपुर, रोपड़, सैफाबाद में परमात्मा के उपदेश लोगों को देने के बाद खिआला
(खदल) पहुंचे। खिआला में धर्म का प्रचार करते हुए दमदमा साहब पहुंचे, यहां से वह कुरुक्षेत्र के लिए रवाना हुए. कुरुक्षेत्र से
यमुना नदी के किनारे चलते -चलते वह कड़ामानकपुर नामक स्थान में पहुंचकर। उन्होंने
यहां पर भाई साधु मलूकदास जी का मार्गदर्शन किया।
इसके
बाद गुरु तेग बहादुर जी धर्म के प्रचार - प्रसार, लोगों के मार्गदर्शन करते हुए, प्रयाग, बनारस, पटना असम गए,ओर कई क्षेत्रों का भ्रमण किया। इन यात्राओं में उन्होंने अंधविश्वास की
कठोर आलोचना के साथ आध्यात्मिक, धर्म का ज्ञान, सामाजिक भेदभाव से लोगों को जागरूक किया। इसके अलावा लोगों
के सुख के लिए धर्मशाला बनवाई और कुएं खुदवाये।
इन्हीं धार्मिक यात्राओं के दौरान पटना साहब में गुरु तेग बहादुर जी को साल 1966 में पुत्र की प्राप्ति हुई। जिनका नाम गोविंद सिंह जी था. जो आगे चलकर सिख धर्म के दसवें गुरु "गुरु गोविंद सिंह” जी बने।
गुरु तेग बहादुर जी के
बलिदान का वर्णन
यह ओरंगजेब के शासन के अत्याचारों की ऐतिहासिक घटना है. जिसे कभी भी भुलाया नहीं जा सकता। ओरंगजेब को सभी धर्मों के ग्रंथों को जानने की काफी दिलचस्पी थी. उनके दरबार में एक विद्वान पंडित रोज आकर ओरंगजेब को गीता के श्लोकों को पढ़कर उनका अर्थ समझाता था. कई श्लोक ऐसे होते थे जिनका वर्णन वह ओरंगजेब के सामने नहीं करता था. एक दिन किसी कारण वश पंडित दरबार में जाने के लिए असमर्थ होता है। तब वह अपने पुत्र को गीता के श्लोक सुनाने के लिए ओरंगजेब के दरबार में भेजता है। पंडित अपने पुत्र को बताना भूल जाता है कि उसने कई श्लोकों का अर्थ ओरंगजेब को नहीं सुनाया है तुम भी मत सुनना।
पंडित
का पुत्र दरबार में पहुंचकर ओरंगजेब को गीता के सभी श्लोकों को सुनाकर उनका अर्थ
भी बता देता है। ओरंगजेब को गीता के सभी श्लोकों को समझने के बाद ज्ञात होता है कि
सभी धर्मों के ग्रंथों का अपना महत्व है और सभी धर्म अपने में आदर्श है। लेकिन
अपने धर्म के अलावा किसी दूसरे धर्म की बढ़ाई सुनना ओरंगजेब पसंद नहीं करता था. तभी
उनके सलाहकारों ने उन्हें सलाह दी कि अन्य धर्म के लोगों को भी इस्लाम धर्म कबूल
करना चाहिए। ओरंगजेब को यह सलाह अच्छी लगी और उन्होंने सभी धर्मों के लोगों को
इस्लाम धर्म कबूल करवाने का आदेश दिया। इसके साथ यह भी आदेश दिया जो भी लोग इस्लाम
धर्म कबूल नहीं करता उसको मौत के घाट उतार दिया जाए। इस कार्य के लिए उन्होंने
अपने कुछ लोगों को लगा दिया।
ओरंगजेब
के आदेश के बाद लोगों का जबरदस्ती
धर्मांतरण शुरु हो गया, जो भी अन्य
धर्म के लोग इस्लाम कबूल करने से मना करते उनके ऊपर अत्याचार किया जाने लगा, उन्हें तरह-तरह की यातनाएं दी जाने लगी या फिर मार दिया जाता। इन यातनाओं और अत्याचारों
से दुःखी होकर कश्मीरी पंडित गुरु तेग
बहादुर जी के पास पहुँचकर अपने धर्म को
बचाने विनती करने लगे।
उसके
बाद गुरु तेग बहादुर जी ने पंडितों से कहा
तुम मेरी एक बात ओरंगजेब तक पहुँचाओ यह कि गुरु जी ने कहा सबसे पहले तुम गुरु तेग
बहादुर से इस्लाम धर्म कबूल करवाओ, उसके बाद हम स्वयं इस्लाम धर्म कबूल कर लेंगे, परन्तु यदि तुम गुरु तेग बहादुर से इस्लाम धर्म कबूल नहीं
करवा पाते तो फिर हम भी इस्लाम धर्म को कबूल नहीं करेंगे। यह बात पंडितों ने
ओरंगजेब के दरबार में जाकर कही तब ओरंगजेब ने
इस बात को स्वीकार कर लिया।
फिर गुरु तेग बहादुर जी खुद ओरंगजेब के दरबार दिल्ली गए. ओरंगजेब ने गुरु तेग बहादुर जी से मिलकर उनको कई चीजों का लालच दिया लेकिन वह नहीं माने, फिर उनके ऊपर जुल्म किया गया और उन्हें बंधी बना लिया गया। ओरंगजेब को लगा यदि गुरु तेग बहादुर ने उनकी बात नहीं मानी तो इससे उसकी छवि को नुकसान पहुंचेगा। फिर गुरु तेग बहादुर जी को डराने के लिए उनके दो शिष्यों की हत्या कर दी गई, फिर भी वह अपने वचन पर अटल रहे। तब गुरु तेग बहादुर जी ने ओरंगजेब से कहा "शीश कटा सकते हैं केश नहीं" तुम्हारा इस्लाम धर्म यह नहीं कहता किसी को जबरदस्ती इस्लाम कबूल करवाओ, जो सच्चा मुसलमान होता है, वह यह कार्य कभी नहीं करेगा। यह बात सुनकर ओरंगजेब क्रोधित हो जाता है। गुरु तेग बहादुर जी को मृत्युदंड देने का आदेश देता है।
गुरु तेग बहादुर जी की शहादत
ओरंगजेब
ने दिल्ली के चांदनी चौक में गुरु तेग बहादुर जी का शीश काटने का आदेश 24 नवंबर,1675 को दिया।
उन्होंने धर्म की रक्षा करते हुए अपनी शहादत मुस्कराते हुए दी। दिल्ली के चांदनी
चौक में जिस स्थान में वह शहीद हुए थे. उस स्थान पर उनकी याद में गुरुद्वारा बनाया
गया। जिसका नाम शीशगंज साहिब गुरुद्वारा रखा गया।
गुरु तेग बहादुर जी के पवित्र शरीर का अंतिम संस्कार गुरुद्वारा रकाबगंज
साहिब (दिल्ली) में किया गया। हर साल 24 नवंबर को उनका शहीदी दिवस मनाया जाता है।
Question.गुरु
तेग बहादुर जी की जयंती कब मनाई जाती है?
Answer.गुरु तेग
बहादुर जी की जयंती हर साल 01 अप्रैल को
Question.गुरु
तेग बहादुर जी का शहीदी दिवस कब मनाया जाता है?
Answer.गुरु तेग बहादुर जी का
शहीदी दिवस 24 नवंबर को

0 Comments