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गोवर्धन पूजा 2021का शुभ मुहूर्त! गोवर्धन पूजा की विधि! गोवर्धन पूजा की सामग्री!

 गोवर्धन पूजा कब है? गोवर्धन पूजा का शुभ मुहूर्त! गोवर्धन पूजा क्यों मनाई जाती हैगोवर्धन पूजा की विधिगोवर्धन पूजा की सामग्री!

 

कार्तिक का महीना त्योहारों का महीना होता है। इस महीने में धनतेरस, छोटी दिवाली, बड़ी दिवाली पर्व के अगले दिन गोवर्धन पूजा का पर्व मनाया जाता है। जिसे अत्रकूट भी कहा जाता है। यह पर्व भगवान श्री कृष्ण जी के बचपन की लीलाओं से जुड़ा है। प्राचीन काल में भारी वर्षा से बृजवासियों को बचाने के लिए श्री कृष्ण जी ने अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत को उठाया था. इसलिए इस दिन गोवर्धन पर्वत की पूजा करने का विधान है। इसके साथ इस दिन गो माता की पूजा भी की जाती है। गोवर्धन पूजा के दिन लोग अपने घर के आंगन में गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाकर उसकी पूजा श्रदा - भक्ति से करते है।  

 

गोवर्धन पूजा कब है?

गोवर्धन पूजा हर साल हिंदू कैलंडर के मुताबिक कार्तिक महीने में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के दिन मनाया जाता है। जो दिवाला के अगले दिन होती है। जो साल 2021 में 05 नवंबर को शुक्रवार के दिन है।

 

गोवर्धन पूजा का शुभ मुहूर्त

गोवर्धन का पूजन शुभ मुहूर्त के समयानुसार पूरे विधि - विधान से करना चाहिए। इस साल 2021 में गोवर्धन पूजन का शुभ मुहूर्त इस प्रकार है।

1. गोवर्धन पूजा सुबह का शुभ मुहूर्त: 06 बजकर 40 मिनट से 08 बजकर 49 मिनट तक

2. गोवर्धन पूजा दुपहर के बाद का शुभ मुहूर्त: 03 बजकर 21 मिनट से 05 बजकर 32 मिनट तक

 

गोवर्धन पूजा क्यों मनाई जाती है?

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब भगवान कृष्ण जी बालक थे. तब उन्होंने अपनी मां यशोदा जी और पूरे बृजवासियों को इंद्र की पूजा करते हुए देखा। फिर बालक कृष्ण जी ने मां यशोदा जी से इंद्र की पूजा करने का कारण पूछा। यशोदा जी ने कृष्ण जी को बताया इंद्र की पूजा करने से बृज धाम में सही समय पर बारिश होती है जिससे बृजवासियों को अच्छी फसल मिलती है और ग्वालों की गाय के लिए घास। तब कृष्ण जी ने मां यशोदा और समस्त बृजवासियों को बताया कि हमें इंद्र की पूजा नहीं करनी चाहिए। बल्कि हमें गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए, क्योंकि ग्वालों की गाय गोवर्धन पर्वत पर चरने जाती है और वर्षा भी गोवर्धन पर्वत के कारण होती है। हमें इस  पर्वत से बहुत कुछ मिलता है। हमने तो कभी इंद्र को देखा भी नहीं जबकि गोवर्धन पर्वत हमारे सामने है। यह बात सुनकर सभी बृजवासियों ने इंद्र की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा करना शुरू कर दिया।

जब यह बात इंद्र को पता चली, तो वह क्रोधित हो गए। उन्होंने क्रोध में आकर पूरे बृज धाम पर घनघोर वर्षा शुरू कर दी। इस वर्षा से समस्त बृजवासियों का जीवन अस्त - व्यस्त हो गया। फिर बृजवासियों ने इस वर्षा से पूरे बृज धाम को बचाने के लिए कृष्ण जी से प्रार्थना करी। तब कृष्ण जी ने इस घनघोर वर्षा से बृजवासियों के जीवन को बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत को 7 दिनों तक अपनी छोटी उंगली पर उठा कर रखा और सब बृजवासियों ने  गोवर्धन पर्वत के नीचे शरण लेकर अपने प्राण बचाए। जब इंद्र को यह ज्ञात हुआ, कि कृष्ण जी भगवान विष्णु जी के रुप है। तब उन्होंने तुरंत वर्षा को रोक दिया और पृथ्वीलोक में आकर कृष्ण जी से अपनी गलती की शमा मांगी। उसके बाद कृष्ण जी ने गोवर्धन पर्वत को नीचे रखा और  समस्त बृजवासियों से कहा इस पर्वत ने हमारा सुख और दुःख दोनों समय में साथ दिया है। इसलिए गोवर्धन पर्वत की हर साल पूजा करके अत्रकूट पर्व मनाए। तब से हर साल कार्तिक महीने में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के दिन गोवर्धन पूजा मनाई जाती है।

 

गोवर्धन पूजा की विधि

गोवर्धन पूजा के पर्व को खासतौर से उत्तर भारत में मनाया जाता है। इस दिन सुबह उठकर शरीर पर तेल की मालिश कर के स्नान करें. यह प्राचीन काल से चली आ रही प्रथा है। सबसे पहले घर के आंगन में गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति लेटे हुए पुरुष जैसी बनाए। उसके साथ फूल, पेड़ पौधे, गाय की आकृति बनाए। फिर भगवान कृष्ण जी की मूर्ति या प्रतिमा गोवर्धन पर्वत के मध्य में रखें। इसके बाद गोवर्धन पर्वत की आकृति पर पूरी श्रदा भाव से रोली, चावल, खीर, बताशे, दूध, दही, जल, केसर और पान चढ़ाकर दीपक जलाएं। फिर गोवर्धन पर्वत की पूजा करें, पूजा के बाद गोवर्धन पर्वत की आकृति पर परिक्रमा लगाए। इसके बाद भगवान को भोग लगा कर गोवर्धन पूजा की कथा सुने। फिर प्रसाद का वितरण करके खुद भी ग्रहण करें। गोवर्धन पूजा करने से भगवान कृष्ण का आशीर्वाद उनके भक्तों पर पूरे साल बना रहता है। इस दिन गाय को चारा खिलाना भी अत्यंत शुभ माना जाता है।

 

गोवर्धन पूजा की सामग्री

गाय का गोबर, गेहूँ, चावल, बताशे, दूध, रोली, केसर, पान, दही, गंगाजल, हरा चारा, शहद, मिठाई, फल, धूप या अगरबत्ती, मिट्टी का दीपक, फूल माला आदि।





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