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धनतेरस 2021 का शुभ मुहूर्त ! धनतेरस क्यों मनाया जाता हैं? धनतेरस की पौराणिक कथा, पूजा विधि

 

धनतेरस कब है? धनतेरस पूजा का शुभ मुहूर्त ! धनतेरस क्यों मनाया जाता हैं? धनतेरस की पौराणिक कथा, धनतेरस के दिन लक्ष्मीजी घर में कैसे प्रवेश करती है! धनतेरस के दिन यमराज देवता की पूजा, धनतेरस की पूजा विधि !

 

धनतेरस के त्यौहार से दीपावली के पर्व का आगमन हो जाता है। जो धनतेरस से पांच दिनों तक चलता है। धनतेरस का त्यौहार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की तेरहवीं तिथि को मनाया जाता है। धनतेरस को दीपावली पर्व के दो दिन पहले मनाया जाता है। हिन्दू शास्त्रों में ऐसा कहा गया है,कि समुंद्र मंथन के दौरान कृष्ण पक्ष की तेरहवीं तिथि को भगवान धन्वंतरि का जन्म हुआ था. इस दिन समुंद्र मंथन से 14 रत्न प्रकट हुए थे. धनतेरस के दिन भगवान धन्वंतरि, माँ लक्ष्मीजी - गणेश जी की पूजा के साथ कुबेर देवता और अकाल मृत्यु के योग से बचने के लिए यमराज देवता की भी पूजा का विधान है। हिन्दू धर्म की रीती रिवाजों के अनुसार इस दिन सोना -चांदी और नए बर्तन खरीदना काफी शुभ माना जाता है। 

धनतेरस कब है?

धनतेरस हिन्दू कैलेंडर के अनुसार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की तेरहवीं तिथि को मनाया जाता है। जो अब की बारी 02 नवंबर, 2021 को मंगलवार को है। इस से अगले दिन छोटी दीपावली है और धनतेरस के दो दिन बाद दीपावली है। 

धनतेरस पूजा का शुभ मुहूर्त !

धनतेरस पूजा का शुभ समय :शाम के 6 बजकर 19 मिनट से शाम को 8 बजकर 17 मिनट तक

प्रदोष काल : शाम के 5 बजकर 42 मिनट से शाम को 8 बजकर 17 मिनट तक

वृषभ काल : शाम के 6 बजकर 19 मिनट से शाम को 8 बजकर 18 मिनट तक

धनतेरस क्यों मनाया जाता हैं?

हिन्दू कैलेंडर के मुताबिक धनतेरस कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की तेरहवीं तिथि को मनाया जाता है। इस दिन जब राक्षश और देवताओं के द्वारा समुंद्र मंथन किया जा रहा था. तो उसमें से 14 रत्नों की उत्पति हुई थी. उनमें से भगवान धन्वंतरि जी का जन्म भी इन 14 रत्नों में से एक था. जब धन्वंतरि जी का जन्म हुआ। तब उनके हाथ में एक कलश था. जो अमृत से भरा हुआ था। धन्वंतरि जी को भगवान विष्णुजी का ही रुप माना जाता है। विष्णुजी ने ही सृष्टि में आयुर्विज्ञान के विस्तार और प्रसार के लिए धन्वंतरि के रुप में अवतार लिया था. इस लिए इस दिन को धनतेरस और आयुर्वेद दिवस के रुप में मनाया जाता है। इस दिन भगवान धन्वंतरि जी की पूजा करना अत्यंत शुभ माना जाता है। भगवान धन्वंतरि जी समुंद्र मंथन के समय कलश के साथ प्रकट हुए थे, इसलिए इस दिन नए बर्तन खरीदना भी शुभ माना जाता है।

धनतेरस की पौराणिक कथा

धनतेरस के दिन लक्ष्मीजी घर में कैसे प्रवेश करती है!

हिन्दू पौराणिक कथाओं में हर त्यौहार का अपना महत्व है। धनतेरस के दिन माँ लक्ष्मीजी की पूजा करने एक महत्व और कथा है। एक दिन भगवान विष्णुजी स्वर्ग लोक से पृथ्वी लोक की ओर जा रहे थे. तभी उनकी पत्नी देवी लक्ष्मीजी ने भी उनके साथ चलने की इच्छा जाहिर की फिर भगवान विष्णुजी ने कहा तुम मेरे साथ चल सकती हो, लेकिन एक शर्त है। यदि तुम मानोगी तो चलो मेरे साथ पृथ्वी लोक,लक्ष्मीजी ने उनकी शर्त को कबूल कर लिया। भगवान विष्णुजी और माँ लक्ष्मीजी जब पृथ्वी लोक में पहुंचे, तब विष्णु जी ने कहा में दक्षिण दिशा की तरफ जा रहा हूँ, में जब तक लोट कर ना आऊं तुम इस ही जगह में मेरा इंतजार करना। लक्ष्मीजी ने कहा ठीक है, में तुम्हारा यही इंतजार करती हूँ , विष्णु जी दक्षिण दिशा की तरफ निकल जाते है।

तब लक्ष्मीजी सोचती है, ऐसी क्या बात है जो उन्होंने मुझे साथ चलने से मना कर दिया। फिर लक्ष्मीजी ने चुपके से दक्षिण दिशा की ओर बढ़ना शुरू किया। जब वह विष्णुजी का पीछा कर रही थी उन्हें रास्ते में एक फूलों का बाघ मिला, जिससे उन्होंने फूल तोड़कर अपने बालों का श्रृंगार किया, उसके बाद थोड़ी दूर आगे चलकर उन्हें गन्ने का खेत मिला, जिसमें से वह गन्ने तोड़ रही थी. तभी वहां विष्णुजी आ जाते है और उन्हें देखकर क्रोधित हो कर कहते है, तुमने एक किसान की खेती से उसकी आज्ञा के बिना उसके फूल और गन्ने तोड़े, जो उसने बड़ी मेहनत से अपनी खेती में उगाए थे और मेने तुम्हें एक ही जगह पर इंतजार करने के लिए कहा था परन्तु फिर भी तुम मेरे पीछे -पीछे चली आई. ऐसा करके तुम पाप की भोगिनी बनी हो। मै तुम्हें शाप देता हूँ। जिस किसान की तुमने फ़सल नष्ट की है, उसकी तुमको 12 वर्षों तक सेवा करनी होगी। लक्ष्मीजी इस शाप को स्वीकार करते हुए किसान के घर जाती है। तब किसान की आय में चौगुनी वृद्धि होती है और उसका घर धन से भर जाता है।

12 वर्ष बाद जब भगवान विष्णुजी किसान के घर से लक्ष्मीजी को लेने आते है। तब किसान उनको ना जाने की विनती करता है। विष्णुजी किसान को समझाते है कि लक्ष्मीजी धन की देवी है, मेरे शाप के कारण यह 12 वर्ष तक तुम्हारे साथ रही। लेकिन किसान फिर भी नहीं मानता, तब लक्ष्मीजी कहती है तुम कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की तेरहवीं तिथि को अपने घर को स्वच्छ करके शाम को दीपक जलाकर मेरी पूजा करोगे तो पूरे साल धन के रुप में तुम्हारे साथ रहूंगी। तब से ही धनतेरस के दिन माँ लक्ष्मीजी की पूजा की जाती हैं।

धनतेरस के दिन यमराज देवता की पूजा का भी है विधान

धनतेरस के दिन जैसे भगवान धन्वंतरि जी, कुबेर देवता, लक्ष्मीजी की पूजा विधान है। वैसे ही यमराज देवता का भी पूजा का विधान है। प्राचीन काल के समय में एक हेम नाम का राजा था, जिसकी शादी के कई वर्ष बाद एक पुत्र हुआ। जब उन्होंने अपने पुत्र की कुंडली ज्योतिषी से बनवाई। तब ज्योतिषी ने उन्हें बताया कि तुम्हारे पुत्र की कुंडली में शादी के दसवें दिन मृत्यु का योग है। यह बात सुनकर राजा परेशान हो जाता है और अपने पुत्र को दूर जंगल में भेज देता है। जहां कोई स्त्री नहीं होती, लेकिन होनी को कौन टाल सकता है।

जंगल में राजा के पुत्र को एक लड़की मिलती है, दोनों में प्रेम होता है, और किसी को बताये बगैर शादी कर लेते है। शादी के दसवें दिन जब यमदूत उस लड़के के प्राण लेने के लिए धरती पर आए ,तब यमदूत को उसकी पत्नी का दुःख देख कर मन दुखी हो गया। फिर यमदूत उस लड़के के प्राण लेकर दुखी मन से यमलोक में यमराज जी के पास पहुंचे, तब यमराज जी ने कहा अकाल मृत्यु में दुखी होना स्वाभाविक है, लेकिन हम अपने कार्य के आगे मजबूर है। फिर यमदूत ने यमराज जी से पूछा, कि अकाल मृत्यु को रोकने का कोई तो उपाय होगा। तब यमराज जी ने बोला जो भी मनुष्य कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की तेरहवीं तिथि को संध्याकाल के समय अपने घर के द्वार और दक्षिण दिशा में दीपक जलाएगा, तो उसके ऊपर से अकाल मृत्यु का योग टल जाएगा। इसलिए धनतेरस के दिन यमराज देवता की पूजा की जाती है।

धनतेरस की पूजा विधि !

इस दिन सबसे पहले चौकी पर लाल कलर का कपड़ा बिछाये, फिर गंगाजल छिड़क कर भगवान धन्वंतरि जी, कुबेर देवता, लक्ष्मीजी और गणेश जी की प्रतिमा या फोटो चौकी के ऊपर स्थापित करे, अब भगवान की प्रतिमा के सामने दीपक, धूप जलाकर, उनका तिलक करें, इसके बाद उस दिन आप ने जो भी बर्तन और धातु की खरीददारी करी है उसे भगवान के चरणों में रखे, सबसे पहले गणेश जी की पूजा कर के धन्वंतरि जी, कुबेर देवता, लक्ष्मीजी के स्तोत्र और यंत्र का पाठ करके, लक्ष्मीजी की चालीसा पढ़ कर भगवान को भोग लगाना चाहिए।



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